Indian News : मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया से चीते आ रहे हैं. आखिर इनकी जरुरत क्यों है? क्यों इन्हें कूनो नेशनल पार्क में भेजा जा रहा है? इनके आने से क्या फायदा होगा? चीतों के आने से किस तरह की कमी पूरी होगी? इस तरह के कई सवालों के जवाब आपको यहां मिलने वाले हैं.

चीता (Cheetah) दुनिया का सबसे तेज भागने वाला जानवर अधिकतम गति 120 किलोमीटर प्रतिघंटा. 1948 में खुले जंगल तीन चीतों का शिकार किया गया. जगह थी छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का साल जंगल. 1952 में चीतों को विलुप्त घोषित कर दिया गया. घोषणा स्वतंत्र भारत के पहले वाइल्डलाइफ बोर्ड मीटिंग के बाद की गई थी. 70 साल तक देश में चीते नहीं थे.. फिर अचानक चीतों को भारत लाने की क्या जरुरत पड़ गई. सब ठीक तो चल रहा था. नहीं सब ठीक नहीं था. आइए जानते हैं क्यों?

ऐसा नहीं है कि पहले चीते नहीं आ सकते थे. 1970 के दशक में ईरान के शाह ने कहा था कि हम भारत को चीते देने के लिए तैयार हैं. लेकिन बदले में आपसे हमें शेर (Lion) चाहिए. लगभग उसी दौरान भारत की सरकार ने वाइल्डलाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट बनाया. जिसे 1972 में लागू किया गया. इसके अनुसार देश में किसी भी जगह किसी भी जंगली जीव का शिकार करना प्रतिबंधित है. जब तक इन्हें मारने की कोई वैज्ञानिक वजह न हो या फिर वो इंसानों के लिए खतरा न बने.

इसके बाद देश में जंगली जीवों के लिए संरक्षित इलाके बनाए गए. लेकिन लोग चीतों को संभवतः भूल गए. असल में इसकी आवाज उठी साल 2009 में. जब वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) ने राजस्थान के गजनेर में दो दिन का इंटरनेशनल वर्कशॉप रखा. सितंबर में हुए इस दो दिवसीय आयोजन में यह मांग की गई कि भारत में चीतों को वापस लाया जाए. दुनिया भर के एक्सपर्ट इस कार्यक्रम में थे. केंद्र सरकार के मंत्री और संबंधित विभाग के अधिकारी भी थे.

इन पांच राज्यों में चीतों के लायक वातावरण


कहा गया कि चार राज्य हैं, जहां पर चीतों को रखा जा सकता है. ये हैं- उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश एक्सपर्ट्स को लगता था कि इन पांचों राज्यों में से किसी भी जगह पर चीतों को रखा जा सकता है. उनके हिसाब से यहां वातावरण ठीक है.. लेकिन फिर तय किया गया कि नहीं हम कुछ सर्वे और बारीक जांच करते है. ईरान से चीतों को मंगाने का ख्याल होल्ड पर रखा गया. वजह ये थी कि ईरान के चीतों का जेनेटिक्स अफ्रीकन चीतों से मिलता जुलता है. लेकिन फैसला गया अफ्रीकन चीतों को लाने के पक्ष में..

पांच राज्यों के 10 जगहों को तय किया गया. ये सात अलग-अलग तरह के लैंडस्केप पर मौजूद हैं. छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास नेशनल पार्क. गुजरात में बनी ग्रासलैंड्स. मध्यप्रदेश में डुबरी वाइल्डलाइफ सेंचुरी, संजय नेशनल पार्क, बागडारा वाइल्डलाइफ सेंचुरी, नॉराडेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी और कूनो नेशनल पार्क, राजस्थान में डेजर्ट नेशनल पार्क वाइल्डलाइफ सेंचुरी और शाहगढ़ ग्रासलैंड्स और उत्तर प्रदेश की कैमूर वाइल्डलाइफ सेंचुरी.

क्यों चुना गया कूनो नेशनल पार्क ?


मोगाबे नाम की अंतरराष्ट्रीय वाइल्डलाइफ मैगजीन के जर्नलिस्ट मनीष चंद्र मिश्र ने बताया कि चीतों के विलुप्त होने के बाद भारतीय ग्रासलैंड की इकोलॉजी खराब हुई थी. उसे ठीक करना था. चीता अंब्रेला प्रजाति का जीव है. यानी फूड चेन में सबसे ऊपर मौजूद जीव. अगर यह नहीं आता तो फूड चेन का संतुलन पूरी तरह से बिगड़ जाता. कूनो नेशनल पार्क चुना इसलिए गया क्योंकि वहां पर चीतों के खाने की कमी नहीं है. यानी पर्याप्त मात्रा में शिकार करने लायक जीव हैं. चीतल जैसे जीव काफी मात्रा में मौजूद हैं. जिन्हें चीते पसंद से खाते हैं. साथ ही इस इलाके में पर्यटन बढ़ेगा. लोग चीतों को देखने आएंगे. राज्य को भी फायदा होगा.


ऐसा नहीं है कि सिर्फ वही दस साइट्स चुने गए थे. उनके अलावा IUCN के नियमों के तहत अगर किसी जीव को कहीं फिर से लाया जाता है तब और जगहों की भी जांच की जाती है. इसलिए पांच और स्थानों की जांच की गई थी. यानी राजस्थान के मुकुंदारा हिल्स टाइगर रिजर्व, शेरगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी और भैंसरोरगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी, मध्यप्रदेश की गांधी सागर वाइल्डलाइफ सेंचुरी और माधव नेशनल पार्क.. कूनो नेशनल पार्क को दोबारा जांचा गया..

कूनो नेशनल पार्क का मौसम सटीक है


चीते (Cheetah) को ग्रासलैंड यानी थोड़े ऊंचे घास वाले मैदानी इलाकों में रहना पसंद है. खुले जंगलों में घने नहीं. वातावरण में ज्यादा उमस न हो. थोड़ा सूखा रहे. इंसानों की पहुंच कम हो. तापमान बहुत ठंडा न हो. बारिश ज्यादा न होती हो. सभी बातों का ध्यान से विश्लेषण करने के बाद पता चला कि कूनो नेशनल पार्क अफ्रीकन चीतों के लिए सबसे उपयुक्त जगह है. यहां पर चीतों के सर्वाइव करने की संभावना सबसे ज्यादा है..

नो नेशनल पार्क 748 वर्ग किलोमीटर का इलाका है. जिसमें इंसानों का आना-जाना बेहद कम है. यहां इंसान नहीं रहते. इस नेशनल पार्क का बफर एरिया 1235 वर्ग किलोमीटर है. पार्क के बीच में कूनो नदी (Kuno River) बहती है. पहाड़ियां हैं, जो बहुत तेज ढाल की नहीं हैं. दक्षिण-पूर्वी इलाके में पन्ना टाइगर रिजर्व से बाउंड्री जुड़ती है. साथ ही शिवपुरी के जंगल हैं. इस इलाके के पास ही चंबल नहीं बहती है. यानी चीतों के पास कुल मिलाकर 6800 वर्ग किलोमीटर का इलाका रहेगा. अधिकतम औसत तापमान 42.3 डिग्री सेल्सियस रहता है. सबसे न्यूनतम तापमान 6 से 7 डिग्री सेल्सियस रहता है. इलाके में सालभर में 760 मिलिमीटर बारिश होती है.

कूनो नेशनल पार्क में खाने की कमी नहीं

कूनो नेशनल पार्क (Kuno National Park) में कोई इंसानी बस्ती या गांव नहीं है. न ही खेती-बाड़ी. चीतों के लिए शिकार करने लायक बहुत कुछ है. जैसे- चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली सुअर, चिंकारा, चौसिंघा, ब्लैक बक, ग्रे लंगूर, लाल मुंह वाले बंदर, शाही, भालू, सियार, लकड़बग्घे, ग्रे भेड़िये, गोल्डेन सियार, बिल्लियां, मंगूज जैसे कई जीव यानी चीता जमीन पर हो या पहाड़ी पर घास में हो या फिर पेड़ पर, उसे खाने की कमी किसी भी हालत में नहीं होगी. नेशनल पार्क में सबसे ज्यादा चीतल मिलते हैं, जिनका शिकार करना चीतों को पसंद आएगा. नेशनल पार्क के अंदर चीतल की आबादी 38.38 से लेकर 51.58 प्रति वर्ग किलोमीटर है. यानी चीतों के लिए खाने की कोई कमी नहीं है.


कूनो नेशनल पार्क में इंसानों की बस्ती


नेशनल पार्क में पहले करीब 24 गांव थे. जिन्हें समय रहते दूसरी जगहों पर शिफ्ट कर दिया गया. ग्रामीण अपने मवेशियों के साथ दूसरे स्थानों पर चले गए. इन्हें कूनो नेशनल पार्क के 748 वर्ग किलोमीटर के पूर्ण संरक्षित इलाके की सीमा से बाहर भेज दिया गया है. ये सारे काम 1998 में ही पूरो हो चुके थे. जाते-जाते ग्रामीणों ने अपनी बिल्लियां और कुत्तों को भी जंगल में ही छोड़ दिया था. करीब 500 के आसपास. ये जानवर भी चीता के शिकार बनने लायक हैं.

कितने चीते आ सकते हैं इस नेशनल पार्क में


किसी भी नेशनल पार्क में किसी बड़े शिकारी जीव को तब लाया जाता है, जब शिकारी की संख्या के अनुपात में शिकार मौजूद है. इसके साथ ही नेशनल पार्क का आकार भी जोड़ा-घटाया जाता है. चीते का शिकार आमतौर पर वो जीव होते हैं, जिनका वजन 60 किलोग्राम के आसपास होता है. जैसे चीतों के शिकार के प्रतिशत की गणना करें तो ये 10 फीसदी लंगूरों का ही शिकार कर पाएंगे. नीलगाय या सांभर की पूरी आबादी का 30 फीसदी हिस्सा ही खा सकते हैं. इन सारे गणित और एनालिसिस के बाद एक्सपर्ट्स के मुताबिक कूनो नेशनल पार्क (Kuno National Park) में 21 चीतों के लिए शिकार है. यानी इतने चीते आ सकते हैं. अगर 3200 वर्ग किलोमीटर में सही प्रबंधन किया जाए तो यहां पर 36 चीते आ सकते हैं. रह सकते हैं और पूरे आनंद के साथ शिकार कर सकते हैं.


क्यों चुना गया नामीबिया के चीतों को?


किसी भी देश से दूसरे देश में जंगली जीवों का प्रत्यर्पण करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखा जाता है. पहला कि जिस देश से चीता आ रहा है, क्या वह देश लगातार कुछ सालों तक चीतों की सप्लाई करता रहेगा. चीतों का जेनेटिक्स कैसा है. व्यवहार कैसा है. उम्र सही है। या नहीं. लिंग का संतुलन कैसा है. साथ ही चीते नामीबिया से आकर मध्यप्रदेश के वातावरण, रहने लायक जगह की स्थिति, शिकार के प्रकार आदि से एडजस्ट कर पाएगा या नहीं. इन मामलों में नामीबिया के चीतों ने ईरान के चीतों को पिछाड़ दिया. फिलहाल अगले पांच साल तक चीतों के लिए नामीबिया से समझौता हुआ है. दक्षिण अफ्रीका से डील प्रोसेस में है.

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