Indian News : नई दिल्ली | दिल्ली के लालकिला बम धमाके के बाद उठे धुएं ने सिर्फ राजधानी के आसमान को धुंधला नहीं किया, बल्कि लोगों के दिलों में भी अंधेरा भर दिया। वारदात से जुड़े आतंकी मॉड्यूल का धर्म चाहे जो रहा हो, निशाना उन निर्दोष मुसलमानों पर साध दिया गया, जिनका इस घटना से कोई लेना-देना ही नहीं था। सोशल मीडिया पर नफरत की यह लहर इतनी तेज चली कि एक मुस्लिम पत्रकार को केवल उसके धर्म की वजह से गालियों, अपमान और भेदभाव का सामना करना पड़ा।

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सोशल मीडिया पर जहरीला माहौल

लालकिला धमाके के बाद कुछ यूज़र्स ने माहौल को समझने के बजाय भड़काना शुरू कर दिया। एक मुस्लिम पत्रकार के पोस्ट पर कमेंट बॉक्स गालियों से भर गया। लोग बिना वजह उनके धर्म पर हमला करते रहे।

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‘मुसलमान होना गुनाह’ जैसी सोच हावी

पत्रकार के खिलाफ की गई टिप्पणियों में ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनका ‘मुसलमान होना’ ही किसी के लिए अपराध हो। धमाके से असंबंधित होने के बावजूद उन्हें जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की गई। यह प्रवृत्ति सामाजिक सौहार्द के लिए खतरनाक संकेत है।

पाकिस्तान भेजने की धमकियां और अपमानजनक शब्दों की बौछार

ट्रोलिंग की भाषा इतनी कटु थी कि कई यूज़र्स उन्हें पाकिस्तान भेजने की बात कहने लगे। कमेंट्स में अपमानजनक शब्द, धार्मिक तंज और व्यक्तिगत हमले किए गए। यह सोशल मीडिया पर बढ़ती असहिष्णुता का सीधा प्रमाण है।

सामूहिक दोषारोपण की प्रवृत्ति फिर सामने आई

किसी एक आतंकी घटना के बाद पूरी कम्युनिटी को कठघरे में खड़ा करने की मानसिकता फिर उभर आई है। यह वही पैटर्न है जिसमें आतंक के खिलाफ गुस्सा निर्दोष नागरिकों पर फूटने लगता है, जबकि असली अपराधी खुले एजेंडे से बच निकलते हैं।

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विशेषज्ञों की चेतावनी—नफरत का माहौल देश के लिए खतरनाक

समाज विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की नफरत न सिर्फ सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकती है। communal targeting से युवाओं में हताशा और अलगाव बढ़ता है, जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए गंभीर चुनौती है।

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