Indian News : नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यह स्पष्ट कर दिया कि राज्यपालों के पास विधानसभाओं द्वारा पारित बिल (विधेयक) पर अनंत काल तक निर्णय टालने का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने यह कहा कि वह गवर्नरों को तीन विकल्प प्रदान करता है — सहमति देना, पुनरविचार के लिए भेजना या राष्ट्रपति को भेजना — लेकिन उन्हें बिलों पर “पूरी पावर” के साथ वीटो लगाने की आज़ादी नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि विधेयकों की मंजूरी के लिए कोई निर्धारित समय सीमा संविधान में नहीं है, लेकिन यदि गवर्नर देरी करते हैं तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
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गवर्नर की “पूरा वीटो” शक्ति नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि गवर्नर को अनलिमिटेड वीटो या “पॉकेट वीटो” का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने यह कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के अंतर्गत गवर्नरों को तीन ही विकल्प दिए गए हैं: सहमति देना, विधानसभा को पुनर-विचार के लिए लौटाना, या राष्ट्रपति को रिज़र्व करना। कोर्ट ने यह भी कहा कि गवर्नरों को उस शक्ति का उपयोग राजनीति-सुविधाजनक तरीके से नहीं करना चाहिए।
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समयसीमा तय करने का न्यायालय का रुख
न्यायालय ने गवर्नरों के लिए स्पष्ट समयबद्ध निर्देश जारी किए हैं। एक विकल्प के साथ सहमति देने की स्थिति में यह अवधि एक महीने तक हो सकती है। यदि गवर्नर विधेयक लौटाना चाहता है या राष्ट्रपति को भेजना चाहता है, तो ऐसी कार्रवाई तीन महीने के अंदर होनी चाहिए। इसके अलावा, यदि कोई विधेयक विधानसभा द्वारा पुनः पारित किया गया है, तो पुनर्प्रस्तुत किए गए बिल पर गवर्नर को एक महीने के अंदर सहमति देनी होगी।
राष्ट्रपति की भूमिका और उनकी देरी पर नियंत्रण
न्यायालय ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयकों पर फैसला करने के लिए तीन महीने का समय मान्य माना जाएगा।यदि राष्ट्रपति इस अवधि में निर्णय नहीं लेते हैं, तो न्यायालय न्यायिक समीक्षा में हस्तक्षेप कर सकता है।
तमिलनाडु विवाद और पिछला मामला
यह फैसला उस विवाद से जुड़ा हुआ है, जहां तमिलनाडु के राज्यपाल R.N. रवि ने 10 विधेयकों की स्वीकृति देने में लंबा समय लिया था। इन विधेयकों को पुनरावृत्ति के बाद वापस भेजा गया, और फिर राष्ट्रपति को भेजा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम “गवर्नर द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया की उपेक्षा” बताते हुए उनका गैर-वफादार व्यवहार माना। न्यायालय ने अनुसूचित शक्तियों के आधार पर इन बिलों को स्वीकृत माना और अनुच्छेद 142 के तहत उनका निर्णय सही ठहराया।
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लोकतंत्र और संवैधानु अधिकार
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यह निर्णय केवल कानूनी तकनीकी मामला नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का मुद्दा है। न्यायाधीशों ने यह कहा कि गवर्नर को जनता द्वारा चुनी गई विधानसभा की “इच्छा और कल्याण” का सम्मान करना चाहिए, और संवैधानु प्राधिकारियों की भूमिका व्यक्तिगत या राजनीतिक एजेन्डा के लिए बाधा नहीं बननी चाहिए।
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