Indian News : नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को साफ निर्देश दिए हैं कि स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों पर दायर कई याचिकाओं के बीच कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। साथ ही, सर्वोच्च अदालत ने इन याचिकाओं पर 19 नवंबर को विस्तृत सुनवाई करने पर सहमति जताई है।

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ओबीसी आरक्षण को लेकर बढ़ी कानूनी हलचल

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद राज्य में ओबीसी आरक्षण को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि सरकार द्वारा तय की गई आरक्षण नीति संविधान के निर्देशों के विपरीत है। कोर्ट की ओर से सुनवाई तय होने के साथ ही कानूनी प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है।

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50% सीमा को सर्वोच्च अदालत ने दोहराया

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि स्थानीय निकायों में कुल आरक्षण 50% की सीमा को पार नहीं कर सकता। यह सीमा मंडल कमीशन और पिछले फैसलों के आधार पर तय की गई संवैधानिक सीमा है। इसलिए राज्य सरकार को इसे ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने होंगे।

महाराष्ट्र सरकार पर बढ़ा दबाव

कोर्ट के निर्देश के बाद महाराष्ट्र सरकार पर कानूनी और राजनीतिक दबाव बढ़ गया है। सरकार को अब ओबीसी आरक्षण के लिए जरूरी डेटा जुटाने, बैकवर्डनेस साबित करने और आयोग की सिफारिशों के आधार पर संशोधित प्रस्ताव दाखिल करने होंगे।

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19 नवंबर को महत्वपूर्ण सुनवाई

19 नवंबर को होने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट याचिकाओं पर विस्तृत चर्चा करेगा। इस दौरान अदालत यह भी देखेगी कि क्या राज्य सरकार ने ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला—

  1. सांख्यिकीय आंकड़ों का संग्रह,
  2. कमीशन की रिपोर्ट,
  3. आरक्षण सीमा का पालन—का सही तरह से पालन किया है या नहीं।

5. राजनीतिक परिदृश्य पर असर तय

ओबीसी आरक्षण लंबे समय से महाराष्ट्र की राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और आगामी सुनवाई के फैसले का प्रभाव आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और राजनीतिक समीकरणों पर सीधे देखा जा सकता है।

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